कवि बुद्धिजीवी की अवधारणा और निवेदित की राह
कवि-बुद्धिजीवी की अवधारणा और नवोदित की राह
भारतीय ज्ञान परंपरा में साहित्य को स्वतंत्र आत्माओं का प्रदेश माना गया है। पर भीतर के भुवन और भवन दोनों में प्रवेश करें तो देखते हैं कि वहाँ भी दरबार हैं, कतारें हैं, और अदृश्य प्रवेश-द्वार हैं जिन पर पहरेदार भी खड़े हैं।
भेंड़चाल तंत्र का उदय ऐसे ही माहौल में जन्मता और बढ़ता है। यह कोई नई बात भी नहीं,लेकिन उसका सबसे गहरा असर केवल स्थापित लेखकों तक ही सीमित रहता नहीं, बल्कि उन नवोदितों पर अधिक पड़ता है जो किसी भी विधा यथा कविता, कहानी, आलोचना, नाटक, डिजिटल लेखन आदि के माध्यम से साहित्य में प्रवेश कर रहे होते हैं। और यहीं से ही एक पूरी पीढ़ी की संवेदना का भविष्य प्रभावित होता है।
भेड़चाल का तंत्र और नवोदित की पहली सीख
अपने निजी अनुभव से कहा रहा हूँ कि कोई भी नया लेखक जब साहित्यिक दुनिया में कदम रखता है, तो वह अपनी रचना के साथ आता है, रणनीति के साथ नहीं। पर भेंड़चाल तंत्र बहुत जल्दी ही उसे कईं हथकंडों से अपना बनाकार उसे निर्देशित करना प्रारंभ कर देता है और अपनी ओढ़ी हुई बड़ी बड़ी मुद्राओं से प्रभावित (स्मरण रहे वे कभी भी प्रेरित नहीं करते) कर बताने लगते हैं कि
किसे पढ़ना, (कैसे नही के बारे में वे प्रायः सिद्ध साधक की तरह मौन ही रहते हैं)
किसे उद्धृत करो
किस किस मंच पर दिखो
किस किस कार्यक्रम में जाना आदि आदि ।
इस घातक और मारक षड्यंत्र के चलते धीरे-धीरे नवोदित को समझ आने लग जाता है कि साहित्य केवल लेखन नहीं, “साहित्यिक व्यवहार” भी है। यहीं से भेड़चाल तंत्र की पाठशाला अपना पहला अध्याय प्रारंभ करती है। उसका शीर्षक होता है मौलिकता की जगह अनुकूलन।
फ्रांसीसी विचारक पियरे बॉर्डियू ने सांस्कृतिक क्षेत्र को भी शक्ति-संबंधों से भरा क्षेत्र माना था, जहाँ पूँजी केवल आर्थिक नहीं, प्रतीकात्मक भी होती है।
नवोदित लेखक को बहुत जल्दी सिखा दिया जाता है कि प्रतिष्ठा भी एक पूँजी है और उसे पाने के लिए जोखिम कम और अनुकरण की अधिक जरूरत है।आप तो जानते ही है कि यश कामना भला किसे नहीं होती।
कवि-बुद्धिजीवी बनाम साहित्यिक करियरिस्ट
कवि-बुद्धिजीवी की आदर्श छवि उस व्यक्ति की है जो अपने समय से जूझता है। अंतोनियो ग्राम्शी ने अपनी प्रिजन नोटबुक में बताया कि“ऑर्गेनिक इंटेलेक्चुअल” समाज की वास्तविक जटिलताओं से जुड़ा होता है। क्योंकि उसका मानना था कि हर मनुष्य में बौद्धिक क्षमता तो होती है, लेकिन समाज में हर व्यक्ति की भूमिका बुद्धिजीवी की भूमिका नहीं होती।
नवोदित को अक्सर इसका उलटा मॉडल दिखाया जाता है।उसे बताया जाता है कि ऐसा प्रत्येक लेखक जो हर मंच पर मौजूद है, हर खेमे के समीप है, और हर बहस में सुरक्षित शब्दों का चयन करता है।उस पर अपनी दृष्टि एकाग्र करो।यह उनकी काक दृष्टि का सर्वोत्तम प्रहार होता है, याद रहे काक चेष्टाxका नहीं।
नतीजा यह होता है कि नया लेखक यह मानने लगता है कि लेखन से पहले नेटवर्क बनाना जरूरी है। विचार बाद में, दृश्यता पहले। संवेदना बाद में, पहचान पहले।
असर का असर
जब किसी समाज में बड़ी संख्या में नए लेखक यही रास्ता चुनते हैं, तो धीरे-धीरे पूरी पीढ़ी की रचनात्मक चेतना बदलने लगती है।इसके कुछ खास लक्षण आप अखिल साहित्य विश्व में देख सकते हैं।यथा
भाषा की एकरूपता
हर कविता/ कहानी या कहें रचना / आलोचना एक जैसी लगने लगती है। वही स्वीकृत विषय, वही सुरक्षित आक्रोश।एक बना बनाया फॉर्मेट।परिणामस्वरूप भाषा अनुभव से नहीं, प्रचलन से संचालित होनी शुरू हो जाती है।
क्षमता का क्षय
विश्व साहित्य की परंपरा यह बताती है कि सच्चा साहित्य जोखिम से जन्मता है। विचार , शिल्प , दृष्टि के जोखिम से। लेकिन जब नवोदित रचनाकार यह देखता है कि व्यवहार में जोखिम उठाने वाले तो प्रायःलंबे समय तक हाशिये पर धकेल दिए जाते रहे हैं, ऐसी पारिस्थितिकी से निर्मित संरचना में फिर वह जोखिम का त्याग कर अपने भविष्य को देखते हुए सुरक्षित और आसान राह को चुनता है।
टी. एस. इलियट ने परंपरा की बात करते हुए भी व्यक्तिगत प्रतिभा पर जोर दिया था। आज परंपरा का अर्थ परंपरागत ढर्रा होता जा रहा है।
नैतिक संवेदना का क्षरण
इस सबका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि जब नया लेखक देखता है कि आस पास के परिवेश में साहित्यिक पाखंड की प्रचण्ड उपस्थिति है, तो उसके भीतर यह विश्वास घर करने लगता है कि शेष जीवन क्षेत्रों की भांति यहां भी ईमानदारी के लिए कोई खास जगह तो सुरक्षित नहीं है। उसका बचा खुचा उत्साह और गति धीरे-धीरे सामूहिक नैतिक थकान में बदलती जाती है।
और फिर नवोदितों को अक्सर भीड़ की तरह इस्तेमाल किया जाता है। सम्मेलनों की श्रोता-दीर्घा भरने, सोशल मीडिया समर्थन देने या वरिष्ठों की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए। बदले में उन्हें आश्वासन मिलता है—“समय की प्रतीक्षा करो”।
यह “समय” अक्सर आ ही नहीं पाता, लेकिन इस बीच यह जरूर होता है कि तब तक नवोदित अपनी स्वतंत्र आवाज़ खो चुका होता है।
और इस तरह बहुत जल्दी एक विद्रोही कवि “माननीय” हो जाता है।
उसके असुविधाजनक प्रश्न “अपरिपक्वता” कहे जाने लगते हैं।
उसकी सच्ची निरीक्षण क्षमता को बड़े बड़े मुहावरों में तिरस्कृत करते हुए परिपक्व बेइमानी की चासनी में लपेटकर उसे एक अघोषित विदूषक बना दिया जाता है।
जॉर्ज ऑरवेल ने चेताया था कि भाषा का पतन विचार का पतन है। यहाँ जोड़ना जरूरी है कि साहित्यिक नैतिकता का पतन अगली पीढ़ी की चेतना का पतन भी है।
अतः आवश्यक है कि नवोदित के पास खुली दृष्टि और बोध दोनों ही हों। वह उनका सम्यक उपयोग भी करें।उसे यह जानना और समझना है कि भले ही इस तरह का दरबार उतना पवित्र नहीं है, जितना उसे दिखता या दिखाया जाता है,पर यह जानना निराशा नहीं, मुक्ति की शुरुआत भी हो सकती है।
उम्मीद के पंख
हर देश, समाज और पीढ़ी में कुछ लोग भेड़चाल से अलग भी चलते हैं। हो सकता है कि अपने ही किन्हीं कारणों के चलते वे आपको आयोजनों कम दिखते हैं या कम बुलाए जाते हैं, पर इतिहास यह साफ और स्पष्ट बता रहा है कि देश ,समाज के लिए समय के रास्ते वे ही बनाते आए हैं। कबीर या रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि आदि हर क्षेत्र की विभूतियों ने अपने अपने समय की स्वीकृतियों से बाहर जाकर लिखा/ किया। शुरू में वे भी सहज स्वीकार्य नहीं रहे।
हाँ,कालांतर में उनका अनुकरण जरूर किया गया।
ऐसे में नवोदित के लिए असली सवाल यह है कि
क्या जल्दी पहचाने जाने की अपनी इच्छा को वह स्वयं के हक़ में कितना टाल सकता है?
क्या उसमें निरंतर पढ़ते रहने, सोचने के बाद भी असफल होने का साहस है?
स्मरण रहे यहीं से कवि-बुद्धिजीवी की यात्रा शुरू होती है, करियरिस्ट की नहीं।
अस्तु,भेड़चाल तंत्र हमारे समय की साहित्यिक पारिस्थितिकी का बड़ा संकट है। इसका सबसे खतरनाक असर नई पीढ़ी पर पड़ता है, जो सीखती है कि सुविधा रचनात्मकता से अधिक उपयोगी है। इससे साहित्य धीरे-धीरे जीवित अनुभव से कटकर सांस्कृतिक अभिनय में बदल सकता है।
कवि-बुद्धिजीवी की अवधारणा हमें याद दिलाती है कि लेखक का काम केवल लिखना नहीं, अपने समय के नैतिक तंत्र को चुनौती देना भी है। यदि नई पीढ़ी यह साहस खो देती है, तो साहित्य तो बचेगा, पर उसकी आत्मा खो जाएगी,उसमें प्राण स्पंदन नहीं होगा।
और तभी भेड़चाल साहित्य का सबसे लोकप्रिय रूप में स्वीकृति पाएगा जो सुरक्षित, सुगम तो जरूर होगा, पर भीतर से लगभग खाली।
अब चयन सदा से हमारा ही होता है कि हम किस राह पर आगे बढ़ें और उस पर चलते हुए कितने सावधान रहें।
सब शांत और सुखी रहें और अपने अपने मार्ग पर आगे बढ़ें।ईश्वर बहुत दयालु है,अगर भेड़तंत्र के कर्णधार और प्रभावितजन अपनी गलती स्वीकारेंगे,तो ईश्वर उन्हें माफी भी देगा। अपार शिवकामनाएं।
बोलो आज के आनंद की जय।
#साहित्य
#लिटरेचर
#litreysocity
Comments
Post a Comment